( पायल बनर्जी )
शिलांग, 24 मार्च (भाषा) रिडालिन शुलाई अब स्वस्थ हो गई हैं, लेकिन ट्यूबर क्यूलोसिस (टीबी) यानी क्षय रोग के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी है।
मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स जिले की 32 वर्षीय महिला शुलाई ने इस बीमारी के कारण अपना एक फेफड़ा खो दिया था और अब इसके प्रतिकूल प्रभाव से जूझ रही हैं। वह टीबी रोगी से अब टीबी चैंपियन बन गई है और इस बीमारी से लड़ने में न केवल दूसरों की मदद कर रही हैं, बल्कि इससे जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों को भी दूर करने का प्रयास कर रही हैं।
रिडालिन ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “टीबी किसी को भी हो सकता है, फिर भी इससे पीड़ित लोगों को टीका-टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। टीबी से पहले, इससे जुड़ीं सामाजिक भ्रांतियां जान ले सकती हैं। इसलिए मैं इस बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए टीबी चैंपियन बनी हूं।”
टीबी से अपनी लड़ाई के बारे में बताते हुए रिडालिन ने कहा कि जून 2015 में उन्हें लगातार खांसी, थकान, रात में पसीना आना, बाल झड़ना, त्वचा का छिलना और वजन में भारी कमी की समस्या हुई।
उन्होंने कहा कि शुरू में उन्हें लगा कि यह सिर्फ फ्लू है और लक्षणों को नजरअंदाज कर दिया, लेकिन उनकी हालत बिगड़ती चली गई।
उन्होंने कहा, “मैंने होम्योपैथिक और हर्बल पद्धतियों से उपचार की कोशिश की, मैं इससे बहुत डरती थी क्योंकि मेरे पिता की 2013 में टीबी से मृत्यु हो गई थी।”
एक महीने बाद, रिडालिन को टीबी होने का पता चला और 14 सितंबर, 2015 को शिलांग के आर पी चेस्ट अस्पताल में भर्ती कराया गया।
उन्होंने कहा, ‘मेरी हालत इतनी गंभीर थी कि डॉक्टरों ने मेरे परिवार से कह दिया था कि मेरे पास जीने के लिए सिर्फ दो महीने बचे हैं। मेरी मां ने कभी उम्मीद नहीं खोई और नवंबर 2016 तक मुझसे यह सच छिपाए रखा।’
रिडालिन ने कहा कि उपचार का तरीका बहुत कठोर था — छह महीने तक रोजाना इंजेक्शन और दो साल तक 14-16 दवाएं खानी पड़ीं।
उन्होंने कहा, ‘इसके दुष्प्रभाव बहुत भयानक थे — मतली, जलन, नसों में दर्द, कंपन और सुनने की समस्याएं। मेरे पैरों में सुन्नपन जैसे कुछ प्रभाव अब भी बने हुए हैं। मैंने खुद को अलग-थलग कर लिया, टीबी से जुड़ीं भ्रांतियों से बचती रही, जबकि मेरी मां मेरी ताकत बनी रहीं।’
रिडालिन को 23 सितंबर, 2017 को टीबी-मुक्त घोषित किया गया।
उन्होंने कहा, ‘लेकिन मेरी लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई। टीबी ने मेरे बाएं फेफड़े को नष्ट कर दिया था और मेरे पास सिर्फ एक फेफड़ा बचा।”
टीबी से जुड़ी भ्रांतियों के बारे में बात करते हुए, उन्होंने अपनी एक दोस्त के बारे में बताया, जिसे अपने दोस्तों और समुदाय द्वारा बहिष्कृत किए जाने के बाद बहुत अकेलापन झेलना पड़ा और आखिरकार उसने अपनी जान ले ली।
रिडालिन ने कहा, ‘उसके सहपाठियों ने उसे इस हद तक नजरअंदाज़ करना शुरू कर दिया कि वे उसके सामने आने से बचने के लिए अपना रास्ता बदल लेते थे। इससे पहले से ही मौजूद असहनीय दर्द और दुष्प्रभाव और बढ़ गए। मैंने उसे इलाज जारी रखने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की और उसकी काउंसलिंग की। लेकिन वह लड़ाई हार गई और उसने अपनी जान ले ली।’
रिडालिन अब टीबी चैंपियन हैं। वह बीमारी से पीड़ित लोगों को उपचार के नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसके अलावा, वह उन्हें काउंसलिंग भी देती हैं और भावनात्मक रूप से उनका समर्थन करती हैं ताकि वे जीवन से हार न मानें।
भाषा जोहेब मनीषा
मनीषा
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