विश्व कप स्वर्ण के बाद ही पिताजी से नजरें मिलाने की हिम्मत आई : अशोक ध्यानचंद

विश्व कप स्वर्ण के बाद ही पिताजी से नजरें मिलाने की हिम्मत आई : अशोक ध्यानचंद

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  • Publish Date - March 18, 2025 / 07:39 PM IST,
    Updated On - March 18, 2025 / 07:39 PM IST

(मोना पार्थसारथी)

नयी दिल्ली, 18 मार्च (भाषा) पचास वर्ष पहले कुआलालम्पुर में हॉकी विश्व कप फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ विजयी गोल करने वाले अशोक कुमार ने कहा कि उस गोल के बाद ही वह अपने पिता महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद से नजरें मिला सके ।

आठ बार के ओलंपिक चैम्पियन भारत ने अब तक एकमात्र विश्व कप 15 मार्च 1975 को कुआलालम्पुर में जीता था ।

अशोक कुमार ने यहां विश्व कप की उस जीत पर ‘मार्च टू ग्लोरी’ किताब के विमोचन से इतर भाषा को दिये इंटरव्यू में कहा ,‘‘ उस पदक से पहले पिताजी और उनके भाई महान खिलाड़ी रूपसिंह जी के सामने नजरें मिलाने की मेरी कभी हिम्मत ही नहीं थी । उनके सामने मुझे भी फख्र से बताना था कि मैं भी कुछ जीत कर आया हूं ।’’

मेजर ध्यानचंद ने तीन जबकि रूप सिंह ने दो ओलंपिक स्वर्ण जीते थे ।

उन्होंने कहा ,‘‘ मुझे आज भी याद है कि जब मैं स्वर्ण पदक जीतकर आया तो मेरी मां और पिताजी दरवाजे पर खड़े थे । मैने उन्हें पदक दिखाया तो मेरे पिता ने मेरी पीठ पर तीन चार बार थपथपाया । मैं आज भी वह स्पर्श महसूस करता हूं ।’’

अशोक कुमार ने आगे कहा ,‘‘ उसके बाद पिछले साल हॉकी इंडिया ने उनके नाम पर मेजर ध्यानचंद लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार मुझे दिया तो मुझे लगा कि शायद जीवन में कुछ सही किया होगा ।’’

फाइनल मैच में अपना विजयी गोल उन्हें आज भी याद है और मैच से पहले खुद से किया गया वादा भी ।

उन्होंने कहा ,‘‘ विश्व कप घास पर खेला गया था जिस पर हमारी कलात्मक हॉकी का सिक्का खूब चला । छोटी सी जगह से गेंद को निकालकर ले जाना उसी तरह की हॉकी में मुमकिन था । फाइनल से पहले मैने खुद से वादा किया था कि मेरे भीतर जो भी हॉकी है , आज तक जितना भी सीखा है उसका पूरा इस्तेमाल करना है ।’’

उन्होंने कहा ,‘‘ विजयी गोल उसी तरीके का था चूंकि पाकिस्तान के दो खिलाड़ियों को सर्कल पर से चकमा नहीं देता और वहीं से शॉट लेता तो गेंद भीतर जाती ही नहीं । मैं गोल के करीब आया और छोटी सी जगह से दाहिनी ओर वी जे फिलिप को पास दिया और उन्होंने थोड़ा आगे जाकर पेनल्टी स्ट्रोक प्वाइंट पर मुझे ग्राउंड बॉल दिया जिस पर सटीक समय पर पूरी ताकत से मैने फ्लिक किया ।’’

अशोक कुमार ने कहा ,‘‘ उस शॉट में इतनी ताकत थी कि गोल पोस्ट के त्रिकोण बोर्ड पर लगने के बाद कैरम के स्ट्राइकर की तरह घूमती हुई गेंद वापिस आई । यह मेरे लिये बहुत अहम गोल और पल था । हमारे पास सब कुछ था लेकिन विश्व कप गोल्ड नहीं था ।’’

तोक्यो ओलंपिक और पेरिस ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद भारतीय हॉकी के पुराने गौरवशाली दिन फिर लौटने लगे हैं और अशोक कुमार का मानना है कि यह टीम अगले साल विश्व कप में पदक जीत सकती है ।

उन्होंने कहा ,‘‘ हमने विश्व कप जीतने की स्वर्ण जयंती मना ली जिसकी खुशी है लेकिन अफसोस भी है कि अभी तक दूसरी बार नहीं जीत पाये । मैं मौजूइा टीम से इतना ही कहूंगा कि दो ओलंपिक पदक जीतने के बाद हम यह सोचकर खेलें कि दुनिया की किसी भी टीम को हरा सकते हैं ।’’

उन्होंने कहा ,‘‘जीत की मानसिकता के साथ खेलना जरूरी है, पदक खुद ब खुद मिलेगा । हमने भी ऐसा ही किया था और जीते ।

भाषा

मोना पंत

पंत