ना बने 'छद्म पीड़ितों' का 'चारा'
Last Update: 06 Jan 2016 19:28
   
बात बीते दिनों की है लेकिन है अब भी प्रासंगिक। पिछले दिनों मीडिया और सोशल साइट्स की दीवारों पर आपने भी देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता पर बहस के दौर देखे सुने होंगे। हो सकता है चाहे-अनचाहे आप भी इस बहस का हिस्सा बने होंगे या बना दिए गए होंगे। अव्वल तो किसी भी भारतीय के लिए ये मानना भी समझ से परे है कि देश में कोई असहिष्णुता का माहौल है। इसे किसने छेड़ा,क्यों छेड़ा,किसे लाभ हुआ,किसे हानि हुई इस बहस में पड़े बिना एक छोटी सी बात जो समझ आई और समझने की जरूरत महसूस हुई वो ये कि कहीं हम इनका चारा तो नहीं बने या बनाए गए ? ऐसा सोचने की सबसे मौजू वजह भी है। बीते दिनों दो बड़ी फिल्में अपने पूरे ऊरूज और तामझाम के साथ रूपहले पर्दे पर आईँ (दिलवाले और बाजीराव मस्तानी )।
जमकर प्रचार हुआ,दोनों फिल्मों का अलग-अलग वजहों से दर्शकों को इनका इंतजार भी था लेकिन तभी सोशल साइट्स पर एक बहस उभरी की इनमें से एक फिल्म के नायक असहिष्णुता के शिकार हुए हैं ये बयान दे चुके हैं,जो सरासर गलत है इसीलिए उस फिल्म को ना देखें...ये भी बताया गया कि ऐसा करके कैसे हम उन्हें सबक सिखा सकते हैं...ये दुहाई भी दी गई कि फिल्म को ना देख कर हम अपना 'राष्ट्रधर्म' निभा सकते हैं।जितनी तेजी से इस फिल्म के खिलाफ प्रचार हुआ उतनी ही ताक़त के साथ सोशल साइट्स पर 'बेचारे नायक' के बयान और फिल्म के पक्ष में फिल्म देखी...देखने जा रहे हैं...वाबत सेल्फी अभियान भी छिड़ा। लोगों ने नायक के प्रति अपनी 'फैन परस्ती' का फुल सपोर्ट दर्शाया । ये रणनीति भी एक्सपोज़ हुई की कैसे फिल्मों के लिए स्क्रीन्स की संख्या की जंग छिड़ी,वहां भी भारी सियासी दांव-पेंच तक दिखाई दिए। खैर फिल्म आई...जिसे जो फिल्म देखनी थी,उसने वो देखी। मैने भी बारी-बारी से दोनों फल्मों को सिर्फ और सिर्फ फिल्मों के शौकीन दर्शक की नज़र से देखा। जो मैने मससूस किया यकीनन आपने भी वही मससूस किया होगा...फिल्म बाजीराव मस्तानी और दिलवाले के बीच कोई तुलना ही नहीं। फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' अभिनय,संगीत,सेट्स,लोकेशन्स,निर्देशन ,प्रस्तुतिकरण हर लिहाज से इतने ऊँचे पायदान पर स्थापित होती है जिसे दूर-दूर तक फिल्म 'दिलवाले' छू भी ना पाई है। अफसोस इतने समय बाद पर्दे पर लौटी स्वभाविक अभिनेत्री काजोल जो हरदिल अजीज रहीं हैं वे भी इस फिल्म में केवल सुंदरता के कलेवर में खोखली सी नज़र आईँ हैं। खैर,मूल बात ये एक तरफ फिल्म को हिट कराने को लेकर फिल्ममेकर ने पहले हफ्ते में ही ज्यादा स्क्रीन्स पर कब्जा करने की रणनीति पर काम किया जिस पर आपका हमारा बस नहीं था लेकिन दूसरी तरफ फिल्म के नायक को असहिष्णुता का शिकार,पीड़ित बताकर जो भावनात्मक खेल खेला गया वो बेहद हैरत भरा और कष्टकारी रहा। ये कहते हुए कतई संकोच नहीं कि अगर यूं साथ-साथ रिलीज फिल्मों के बीच खुद को हिट कराने होड़ में ये विवाद,ये छद्म पीड़ित होने का नाटक ना होता तो शायद इन फिल्मों की तुलना कभी एक स्तर पर होने काबिल ही नहीं है।
दूसरी तरफ देश में असहिष्णुता के छद्म विषय को उछालने के पीछे जिन नायक और उनके पत्नि के बायन की सबसे बड़ी भूमिका रही वो एक बार फिर भारत के अतुल्य स्वरूप के ब्रेंड एम्बेसडर बन गए हैं जो सिद्ध करता है कि वो सारे बयान कहीं ना कहीं अपने निज स्वार्थों के वशीभूत दिए गए,फैलाए गए और अगर वो वाकई ग़लती से पब्लिक डोमेने में आए तो फिर उनका खंडन उतनी तेजी और ईमानदारी से नहीं हुआ जिसकी दरकार रही । हालांकि ये बात बहुत हल्कि थी कि कौन सी फिल्म देखें या ना देखें। किसने किस फिल्म को पसंद या नापसंद किया ये भी अपनी-अपनी रूचि का विषय है लेकि सबसे गंभीर बात ये है कि एक बेमानी सी बहस से जो कहीं ना कहीं लोगों के इमोशन्स से जुड़ती है उसे आधार बनाकर प्रचार किया गया,जो सरासर गलत है। ये पहली बार भी नहीं हुआ कि किसी फिल्म के लिए किसी विवाद का सहारा लेकर उसे हिट किया जाए लेकिन उसमें फंसना,उससा हिस्सा बनाना ये भूल बार-बार दोहराया जाना वाकई अपरिपक्वता है खास कर इतने भारी भावनात्मक विषय में। इन सब बातों का निचोड़ ये कि इस तरह की बहस के सूत्रों पर तो हमारा वश नहीं है लेकिन इस तरह की बेकार की बहस का हिस्सा ना बन कर जो सही है,जो वाकई हमारे लिए उचित है उसका चुनाव जरूर कर सकते हैं...ऐस कर अपने बल,धन और समय का सदुपयोग कर पाएंगे इसी में बुद्धिमतता है ।
Last Update: 06 Jan 2016 19:28
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PUNEET
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'SORRY' मुझे हिंदी नहीं आती...!!!
'बड़े परिवर्तन के लिए, बड़े फैसले लेने होंगे'
बस एक क्षण कीजिए विचार - 'आज़ाद' हुए क्या !!!
कौन सा वाला....'दोस्त'?
Welcome अगस्त, हिंदुस्तान तुम्हारा स्वागत करता है