'SORRY' मुझे हिंदी नहीं आती...!!!
Last Update: 15 Sep 2015 19:41
   
10 वां विश्व हिन्दी सम्मेलन,हिन्दी पखवाड़ा,हिंदी दिवस इन आयोजनों को पहली बार काफी करीब से देखने-सुनने-समझने और शायद पहली बार इतनी गहराई से सोचने का मौका मिला,कि एक 'हिंदी राष्ट्र' की कल्पना से,आमूल-चूल कार्य की भाषा हिंदी बनाने से आज के माहौल में इतनी हिचक,इतनी बेचैनी क्यों है ? एक हिंदी मीडिया में,हिंदी भाषा का वाचक/उद्घोषक/एंकर होते हुए भी अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत कितनी ज़रूरी है ये बात मैं खुद कई बार महसूस कर चुका हूं ।
हिंदी दिवस पर विद्वानों संग 'लाइव डिस्कशन' माफ कीजिएगा सीधी बहस में ये मुद्दा उठा कि आज की पीढ़ी को हिंदी को अपनाने में इतनी हिचक क्यों है? अंग्रेजी बोलने में गर्वानुभूति तक तो ठीक है लेकिन आपत्ति इस पर है जब शान से ये कहने लगें कि माफ कीजिए मुझे हिंदी जरा कम आती है,या गर्व से यूं कहें कि मेरे बेटे या बेटी को तो हिंदी गिनती आती ही नहीं। आज की पीढ़ी को यानी 'जेन नेक्स्ट' को पहली नज़र में इसमें कुछ भी ग़लत नहीं लगेगा लेकिन बुद्धिजीवियों और शायद आपको भी थोड़ा गंभीरता से सोचने पर इस 'नज़रिए' में खामियां नज़र आने लगेंगी।इससे पहले की आप इस 'नज़रिए' की खामी को दरकिनार कर आगे बढ़ जाएं क्यों मैं ये सब लिख रहा हूं आपसे साझा करना चाहता हूं। 'हिंदी दिवस' पर हुए विशेष कार्यक्रम में बुद्दिजीवियों संग बहस के दो हिस्से थे जिसमें एक हिस्से में आज की दौर में हिंदी का कम ज्ञान होने को बड़े गर्व से बताने की बढ़ती प्रवृत्ति पर बात हुई जिसके मूल में आज के दौर की शिक्षा प्रणाली जो रोज़गार परक है जिसमें कुछ भी गलत नहीं है, होना भी चाहिए जिसका ज्यादातर पाठ्यक्रम/कोर्स अंग्रेजी में है डॉक्टर बनना हो या कम्पाउंडर,इंजीनियर बनना हो या आर्किटेक्ट या फिर इंटीरीयर डिज़ाइनर सब कुछ अंग्रेजी में है। दूसरे जिस वर्ग के पास धन है , जिसे आप 'टार्गेट सोशल सर्किल' कहते हैं जो आपकी सेवाओं का क्रय करता है उसके सामने भी अपना टैलेंट, स्मार्टनेस दिखाने के लिए अंग्रेजी आवश्यक होती है।यानि रोजगार के लिए और रोजगार हासिल करने के लिए पढ़ाये जाने वाले पाठ्यक्रम दोनों के लिए अंग्रेजी अनिवार्य सी है। और पढ़ो केवल ज्ञान के लिए ये बातें फिल्मों में तो बेहतर लगती हैं लेकिन व्यवहारिक जीवन में बिना रोजगार बेमानी होती हैं। तो क्यों ना माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेजियत की तरफ जाने दें। क्यों ना आज की पीढ़ी अच्छे जीवन-यापन के लिए रोजगार,रोजगार के लिए अच्छी शिक्षा और अच्छी शिक्षा के लिए बेहतर अंग्रेजी वाले कोर्स का चयन करें ?
लेकिन फिर भी हिंदी बोलने में हीनता, बच्चों को 'हिंदी गिनती' नहीं आती में गर्व और सॉरी 'मेरी हिंदी थोड़ी वीक है' में अभिमान का अनुभव तर्कसंगत नहीं है। क्योंकि,जिस अंग्रेजियत के पीछे हम भाग रहे हैं उसी अंग्रेजियत के देश में हिंदी और संस्कृत पर एक नही अनेक विश्वविद्य़ालय, पाठ्यक्रम और शोध खालिस अंग्रेज क्यों कर रहे हैं। क्योंकि वो भी जानते हैं कि दुनियाभर में ध्वस्त होती इकॉनॉमी में सिर ताने खड़े भारत के पास हिंदी में लिखा अर्थशास्त्र का ज्ञान भंडार है, बैचेन लाइफस्टाइल में सुकून देने वाला योग और जीवन दर्शन साथ ही जीवन के विभिन्न स्वरूपों के रहस्य समाहित किए सारगर्भित साहित्य अगर किसी भाषा में है तो वो है हिंदी। जब सात समुंदर पार के गोरे ये बात समझते हैं,इस पर गुपचुप लेकिन लगातार काम करते हैं तो फिर क्यों ना आज की स्मार्ट, टैलेंटेड और रफ्तार पसंद युवा पीढी अपने इस खज़ाने को विलुप्त हो जाने से पहले अपनाए,पढ़े,समझे और संभाले क्योंकि हो सकता है कि कल इसे बताने,पढ़ाने और समझाने वाले अंग्रेजियत के बोझ तले हों ना हों। और फिर अपने ही इस असीमित भंडार को अंग्रेजी में उनके नज़रिए से पढ़ना और समझना ही अंतिम रास्ता बचे। इसीलिए ना अंग्रेजी बुरी ना अंग्रेजियत लेकिन हिंदी बेकार और बेबसी है ये 'नज़रिया' शायद हमारा ही बड़ा नुकसान कर रहा है । एक बार सोचिएगा जरूर दोस्तों...।
Last Update: 15 Sep 2015 19:41
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pevendra kumar poriha (deepak)
अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा को सीखने में कोई बुराई नहीं है बल्कि अपने ज्ञान का विस्तार करना है, बुराई केवल हमारी मातृभाषा को भूलने में अथवा उसके उपयोग में लज्जित अनुभव करने में है।
ना बने 'छद्म पीड़ितों' का 'चारा'
'बड़े परिवर्तन के लिए, बड़े फैसले लेने होंगे'
बस एक क्षण कीजिए विचार - 'आज़ाद' हुए क्या !!!
कौन सा वाला....'दोस्त'?
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