'अनसोशल' बनाती 'सोशल साइट्स' की "होड़"
Last Update: 30 Jul 2015 00:11
   
वक्त बदल रहा है,दौर जुदा है,रवायतें बदल रही हैं तौर-तरीके नए अंदाज में ढल रहे हैं।इसकी मिसाल देखिए एक दशक के भीतर ही खबरों,भावनाओं और प्रतिक्रियाओँ को व्यापक मंच देने वाले सोशल मीडिया ने अब इतना बिजी कर दिया है कि घर की छत के नीचे रहने वालों का हाल भी फेसबुक,ट्विटर और व्हाट्स एप्प पर मिल रहा है।इसमें कोई बुराई नहीं कि अब हर छोटी से छोटी जानकारियों से लेकर देश-दुनिया के बड़े-बड़े मुद्दों पर सर्वसमाज,सर्ववर्ग की प्रतिक्रिया फटाफट बिना मेहनत के,हर वक्त पहुंचती रहती है।सबसे ताजा मिसाल ये कि युवा पीढ़ी को बिगाड़ने की तोहमत झेलने वाली मीडिया,सोशल साइट्स,मैसेजिंग साइट्स का ही असर था की देश के 'मिसाइल मेन' के निर्वाण की खबर चंद मिनिटों में दूर-दूर तक पहुंची।
दूसरी तरफ याकूब को फांसी की खबर पर प्रतिक्रिया,भिन्न-भिन्न मतों,संस्मरणों,विचारों,स्लोगन के संचार से वेब पेज पटे पड़े हैं। विचारों बहस ट्रेंड्स के दौर चल रहे हैं।लेकिन इसी दौर की,इसी इन्वेंशन ने एक नई बीमारी,एक नए चलन,एक नई आदत को भी जन्म दिया वो है फौरन रिएक्ट करने की,हर बात पर रियेक्ट करने की,हर चीज पर कमेंट करने की होड़। इस चलन से ना तो संवैधानिक पदों की गरिमा अछूती रही,ना किसी की निजता और ना विचारों में भिन्नता का साहस। फेसबुक,ट्विटर,वाट्सएप्प या किसी अन्य सोशल प्लेटफार्म पर कोई भी सूचना,खबर,तस्वीर,विचार,मत जिनती जल्दी फैलता है वो काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन इसी जल्दबाजी में कोई अफवाह कितना नुक्सान पहुंचा सकती है ये छत्तीसगढ़ में बच्चा चोर की अफवाह से कुछ लोगों की जान चले जाने के बाद दिखा। किसी की निजी राय या मतभिन्नता उसे किस कदर अपमानित या उपेक्षित कर सकती है ये प्रधानमंत्री के बेटी के साथ कैम्पेन के विरोध में कमेंट करने वाली अभिनेत्री के प्रति अभ्रद टिप्पणियों या गालियों से रंगी उसकी ट्विटर वॉल से दिखा। किसी निजी मौके पर ली गई तस्वीर का किसी कुंठित के द्वारा द्वेश वश सोशल साइट पर वाइरल हो जाना तो इनता आम है कि इसकी कितनी मिसालें दें। इससे मीडिया भी नहीं बचता,जब केंद्रीय मंत्री की शिक्षा पर सवालों वाला कार्यक्रम प्रसारित हुआ तो पार्टी के प्रति वफादारी दिखाने की राजनैतिक मजबूरी में चमचों ने पत्रकार,चैनल उन्हें सपोर्ट करने वालों को अपमानित करने की होड़ से इसके प्रमाण दिए। सोशल साइट्स पर अक्सर ये हो सकता है कि आप किसी के विचार या पोस्ट से सहमत ना हों, उस पर आपका कमेंट करना भी गलत नहीं,लेकिन उसकी जल्दबाजी में मुद्दे की संवेदनशीलता और उस कमेंट के दुष्परिणामों पर किंचित भी विचार ना करना,ये अपरिवक्ता गंभीर नतीजों की तरफ ले जाती है ये सबसे दुखद है। कई बार ये आपके लिए हास्यापद परिस्थितियां बनाती है तो कई बार समाज के लिए घातक साबित होती है।
एक और बात जो मन को अक्सर कचोटती है वो ये कि आज सेल्फी,स्टेटस और ट्रेंड्स से पूरी तरह अपडेट रहने वाले कई साथियों को जिन्हें आप 'सोशली एक्टिव' या 'सोशली चार्ज' कहते हैं उन्हें अपने बेहद आस-पास या यूं कहें अपने ही घर-परिवार की सुध नहीं रहती । फेसबुक पूरा अपडेट रखने वाले अक्सर जब अपने परिजनों को 'फेस' करना भूल जाते हैं तब अक्सर दुविधा बढ़ जाती है। ट्विटर पर ट्रेंड्स का पूरा ख्याल रखने वाले जब अपना ट्रिडिशन आउटडेटेड कहकर भुला देते हैं तब दुश्वारियां बढ़ती हैं। सच है वक्त सिकु़ड़ गया है...वक्त कम पड़ रहा है...कभी किसी किताब,किसी और संदर्भ में पढ़ा था कि कभी वक्त का हिसाब रखने में वक्त जाया मत करना वर्ना वक्त गुजर जाएगा। सो बेहतर है कि वक्त के साथ-साथ चलने की होड़ में अपनों के साथ,अपनों के लिए वक्त की इतनी कटौती ना कर बैठें कि वक्त आने पर सोशली अकेले रह जाएं हम। वर्चुअली सोशल प्लेटफार्म पर इतने बिजी ना हो जाए की रियल सोसायटी में तन्हा खड़े रह जाए हम।
Last Update: 30 Jul 2015 00:11
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PUNEET
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ना बने 'छद्म पीड़ितों' का 'चारा'
'SORRY' मुझे हिंदी नहीं आती...!!!
'बड़े परिवर्तन के लिए, बड़े फैसले लेने होंगे'
बस एक क्षण कीजिए विचार - 'आज़ाद' हुए क्या !!!
कौन सा वाला....'दोस्त'?