जंगलों में बदलते शहर...
Last Update: 07 Apr 2017 18:36

       

जंगलों में बदलते शहर...
है कहां, ढूंढें किधर, जज़्बात को अहसास को...
वही है ज़मी, वही आसमा, सोई पड़ी है आत्मा...
हर डगर लावा यहां, पगडंडीयों में आग है...
धूं...धूं कर जलते शहर...
जंगलों में बदलते शहर...
है कौन तू...क्या नाम है...
खोई यहां पहचान है...
न राग है, न रंग है...कोई किसी के न संग है...
पल-पल यहां बरसते कहर...
जंगलों में बदलते शहर...
टूटती सीमाएं हैं...लूटती अस्मिताएं है...
स्वार्थ-स्वार्थ खेलती, मस्तिष्क खिन्न-भिन्न है...
चिरते हृदय को बोलियां भरमार है...
स्वाहा संस्कृति यहां, विकृतियां शुमार है...
कौन किसका ये भरम, बिक रही लाजो-शरम...
दंभ के दानव यहां, हर रोज़ उगले है ज़हर...
जंगलों में बदलते शहर...

Last Update: 07 Apr 2017 18:36
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